कारक ( Case ) क्या है पूरी जानकारी हिंदी में

कारक ( Case ) क्या है पूरी जानकारी हिंदी में

नमस्कार दोस्तों sikhindia की वेबसाइट पर आप सभी का स्वागत है। आज की पोस्ट उन सभी विधार्थियों के लिए उपयोगी रहने वाली है जो हिंदी व्याकरण का ज्ञान अच्छे से लेना  चाहते है और इस टॉपिक से सम्बंधित परीक्षाओं की तयारी में जुटे हुए है। 

आज के टॉपिक में हम कारक  क्या होते है और कारक  के बारे में सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त करेंगे। 

 संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से उसका संबंध क्रिया या वाक्य के अनशनों के साथ जाना जाए , उसे कारक कहते हैं । दूसरे शब्दों में हम कह सकते है कि संज्ञा या सर्वनाम अपने विविध रूपों में क्रिया के साथ संबंध जोड़ते हैं । कई बार यही संज्ञा या सर्वनाम शब्द दूसरे ( संक्षा , सर्वनाम या अन्य ) शब्दों से संबंध स्थापित कर लेते है और वाक्य के आशय को स्पष्ट कर देते हैं । ये संज्ञा या सर्वनाम शब्द कई बार अपने भूत रूप में प्रयुक्त होते है तो अनेक स्थिति यों में ये परसर्ग या विभक्ति – चिह्न ( कारक चिन्ह ) के साथ आते है । 

परसर्ग रहित संज्ञा , सर्वनाम शब्दों का वाक्यों में प्रयोग

  •   सुनीता चिट्ठी लिखती है ।
  •   राम गाना गाएगा ।
  •   हर्ष गीत गा रहा है । 
  •   मोहन करुण क्रंदन कर रहा है । 
  •   में स्वयं बाजार जाऊँगा । 
  •   तुम फल बचोगे । 
  •  वह छुट्टी बिताकर चली जाएगी ।
  •  हम कल दिल्ली जाएंगे । 

उपर्युक्त वाक्यों में रंगीन , मोटे संज्ञा , सर्वनाम पद ( शब्द ) परसर्ग सहित ( अर्थात मूल रूप में ) प्रयुक्त हुए हैं और क्रिया के साथ संबंध स्थापित करके वाक्य के अर्थ को स्पष्ट कर रहे हैं । 

परसर्ग सहित संज्ञा , सर्वनाम शब्दों का वाक्यों में प्रयोग 

  1.   गीता ने कहानी पढ़ी
  2. सरला ने मोहिनी को पीटा ।। 
  3. मैंने बच्चों को समझाया । . 
  4. तुमने पुत्र को राजनीति से दूर रहने को कहा । 

उपर्युक्त वाक्यों में रेखांकित संज्ञा / सर्वनाम पद परसर्ग सहित ( अर्थात विभक्ति – चिह्न के साथ ) प्रयुक्त हुए हैं और क्रिया के साथ संबंध स्थापित करके वाक्य के अभिप्राय को प्रकट कर रहे हैं ।. 

अब ज़रा इन वाक्यों को ध्यानपूर्वक देखिए 

खंड – क

 सुरेश पत्र लिखता है । 

बच्चे गीत गाते हैं । 

हर्ष घर जाएगा । 

कविता पुस्तक पढ़ेगी । 

श्याम गृह – कार्य करता है । 

रजनी नाचती है । 

खंड – ख

सुरेश ने पत्र लिखा । 

बच्चों ने गीत गाया । 

हर्ष ने घर की राह पकड़ी । 

कविता ने पाठ याद किया । 

कृष्ण ने अत्याचारी कंस को मारा । 

प्रभा ने शेरनियों को देखा । 

जंगल के भयानक दृश्य को देखकर मेरी चीख निकल गई । डाकुओं के अचानक हमले से गांव वाले घबरा उठे ।

 खंड – ग

मोहन का तोता राम – राम रटता है ।खंड – घ 

 दिल्ली यहां से 10 किमी . दूर है । 

अरे बच्चो ! तुम परीक्षा के दिनों में भी सोते हो ।

श्याम की घड़ी गुम हो गयी

है कृष्ण मेरी रक्षा करो

 उपयुक्त वाक्यों को ध्यानपूर्वक पढ़ने पर आपको मालूम हो जाएगा कि 

खंड ( क ) में आए संज्ञा शब्दों का क्रिया : अन्य पदों के साथ सार्थक संबंध है और वे अर्थ देने में पूर्णत : सक्षम हैं । ये संज्ञा शब्द परसर्ग रहित प्रयोग के उदाहरण हैं । अर्थात् विभक्ति – रहित प्रयुक्त हुए हैं ।

 खंड ( ख ) के वाक्यों में आए संज्ञा शब्दों में परसर्गों का प्रयोग आवश्यकतानुसार हुआ है अर्थात् परसर्गों की जरूरत है , वहाँ उनका प्रयोग किया गया है , परंतु जहाँ उनकी आवश्यकता नहीं है वहाँ उनका प्रयोग नहीं किया गया है । ये संज्ञा शब्द आवश्यकतानुसार परसर्ग सहित प्रयुक्त किए गए हैं और परसर्ग सहित प्रयोग के उदाहरण हैं ।

 खंड ( ग ) के वाक्यों को देखने पर यह पता चलता है कि इनमें परसर्गों का आवश्यकतानुसार प्रयोग नहीं किया गया है । अत : इनका संबंध क्रिया व वाक्य के अन्य शब्दों के साथ प्रकट नहीं हो रहा है । इसीलिए ये अर्थ देने में भी सक्षम नहीं हैं । 

खंड ( घ ) के वाक्यों में परसर्गों का जो प्रयोग हुआ है उनका क्रिया से प्रत्यक्ष संबंध नहीं है । उनका या तो अन्य संज्ञा , सर्वनाम या दूसरे शब्दों से ही संबंध है । अर्थात उसका क्रिया से अप्रत्यक्ष और अन्य शब्दों से प्रत्यक्ष संबंध है । अतः स्पष्ट है कि वाक्य का अभिप्राय जानने के लिए कारकों का आवश्यकतानुसार प्रयोग अपेक्षित है । संबंध और संबोधन कारक में इनका क्रिया से अप्रत्यक्ष संबंध होता है परंतु शेष शब्दों और अर्थ ग्रहण से प्रत्यक्ष संबंध होता है । 

कारक के भेद

  1. संप्रदान कारक 
  2. संबोधन कारक परसर्ग या  
  3. कर्ता कारक 
  4. कर्म कारल 
  5. करण कारक 
  6. अपादान कारक 
  7. संबंध कारक 
  8. अधिकरण कारक
 क्रम संख्या । कारक का नाम परसर्ग या विभक्ति चिन्ह 
1 कर्ता ( Nominative ) ने
कर्म ( Accusative ) को
करण ( Instrumental ) से , के द्वारा 
संप्रदान ( Dative ) को , के लिए 
अपादान ( Ablative ) से ( पृथकत्व का भाव )  
संबंध ( Possessive ) का , के , को , रा . रे , रो , ना.न.नी
अधिकरण ( Locative ) में , पर
संबोधन ( Vocative )  हे . अरे , ओ

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1.कर्ता  कारक –

संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से क्रिया के करने वाले का बोध हो , उसे को कहते है और वह पद कर्ता कारक में होता है ।

( 1 ) विभा निबंध लिखती है ।

( 2 ) श्यामा नाचती है ।

( ३ ) मोहन दौड़ में भाग लेगा ।

( 4 ) हम प्रतियोगिता जीत लेंगे ।

प्राकृतिक शक्ति या पदार्थ तथा अन्य जीव – जंतु भी कर्ता के रूप में हो सकते हैं । जैसे

बादल गरजते हैं , बिजली चमकती है । कुत्ते भौंकते हैं । जंगल में मोर नाचता है ।

कर्ता  कारक का विभक्ति – चिह्न ( परसर्ग ) ‘ ने ‘ है । इसका प्रयोग वर्तमान काल और भविष्य काल के वाक्यों में कर्ता के साथ नहीं होता है । ऊपर के वर्तमान और भविष्य काल के वाक्यों में परसर्ग ‘ ने ‘ का प्रयोग नहीं हुआ है । इसी तरह भूतकाल में अकर्मक क्रिया वाले वाक्यों में कर्ता के साथ ने परसर्ग का प्रयोग नहीं होता है ।

जैसे सूरदास अकबर के बुलाने पर भी फतेहपुर सीकरी नहीं गए थे । तुलसीदास राम के अनन्य भक्त थे । वह बाज़ार गया विभक्ति चिह्न ‘ ने ‘ का प्रयोग भूतकाल के उन वाक्यों में कर्ता के साथ होता है , जिनमें सकर्मक क्रियाओं का प्रयोग हुआ हो । जैसे

( 1 ) मोहन ने रामायण पढ़ी

( 2 ) हर्ष ने पार्टी में मधुर गीत गाया ।

( 3 ) मदारी ने बंदरों का खेल दिखाया ।

( 4 ) सुरेश ने सुंदर चित्र बनाया ।

विशेष – कभी – कभी कर्ता के साथ को . से , के द्वारा परसर्गों का भी प्रयोग होता है । जैसे

( 1 ) हरीश को पाठ पढ़ना है ।

( 2 ) मुझे अपना कार्य पूरा करता है ।

( 3 ) बुढ़िया से अव नहीं उठा जाता

( 4 ) नौकर के द्वारा चिट्ठी भेजी गई ।

कर्ता का पता लगाने के लिए कर्तृवाच्य के वाक्यों में क्रिया के साथ कौन , किसने से प्रश्न करें । उत्तर में मिलने वाला पद कर्ता होगा । जैसे

सरला रोटी पकाती है । -कौन पकाती है ? सरला

अमित ने तुम्हें मूर्ख समझा । – किसने समझा ? अमित ने

कर्मवाच्य और भाववाच्य के वाक्यों में किससे / किसके द्वारा से प्रश्न करने पर का कारक का पता चल जाता है ।जैसे 

बुढ़िया से अब नहीं चला जाता । -किससे नहीं चला जाता ? . बुढ़िया से

नौकर के द्वारा चिट्ठी भेजी जा रही है । किसके द्वारा भेजी जा रही है ? नौकर के द्वारा

2. कर्मकारक –

संज्ञा या सर्वनाम का वह रूप , जिस पर क्रिया – व्यापार का फल पड़ता है , कर्म कारक कहलाता है । इसका परसर्ग’को ‘ है ।

कर्म कारक का प्रयोग भी दो प्रकार से होता है

परसर्ग रहित – संत कवि तुलसी ने रामचरितमानस की रचना की थी । वाल्मीकि ने रामायण लिखी थी । हमने अजायबघर में तरह – तरह की वस्तुएँ देखीं ।

परसर्ग सहित प्रयोग – माता ने पुत्र को वस्त्र पहनाए । कृष्ण ने अर्जुन को समझाया । श्रीकृष्ण ने अत्याचारी कंस को मारा ।

कर्म का पता लगाने के लिए क्रिया के साथ क्या ? किसे , किसको ? प्रश्न करें । उत्तर में जो पद मिलेगा , वह कर्म ( कारक ) होगा । जैसे

वाल्मीकि ने रामायण लिखी थी । क्या लिखी थी ? -रामायण

कृष्ण ने अर्जुन को समझाया किसको समझाया ? – अर्जुन को

इस प्रकार रामायण और अर्जुन दोनों ही कर्म  हुए । अत : इन्हें कर्म कारक की श्रेणी में रखा जा सकता है ।

कभी – कभी दो – दो कर्म एक साथ आते हैं । उनमें निर्जीव मुख्य कर्म और सजीव गौण कर्म होता है । जैसे –

माता ने बालक को वस्र पहनाये  । – क्या पहनाए ? -वस्त्र। वस्त्र निर्जीव है । अत : मुख्य कर्म की श्रेणी में आएगा।इसी  प्रकार प्रश्न है- किसको पहनाए ।- बालक को । बालक सजीव है । अत : गौण कर्म माना जाएगा ।

 3 करण कारक

– संज्ञा या सर्वनाम का जो रूप क्रिया के साधन रूप में प्रयुक्त हो , उसे करण कारक कहते हैं । जैसे –

अनुपमा ने पेंसिल से चित्र बनाया । मैं नौकर के द्वारा सामान भेज दूंगा । उसे तार द्वारा सूचित कर दिया गया है । सरला ने दही के साथ रोटी खाई । मैंने टेलीफोन के माध्यम से जानकारी प्राप्त की । वह दमे से मग । उपर्युक्त वाक्यों में से , के द्वारा द्वारा , के साथ , के माध्यम से , आदि करण कारक के परसर्ग हैं । करण कारक का पता लगाने के लिए क्रिया से ‘ किससे ‘ प्रश्न कीजिए । उत्तर में जो पद प्राप्त होगा , वह करन  कारक में होगा ।

4. संप्रदान कारक –

संप्रदान का अर्थ है – देना । जब किसी को कुछ दिया जाए या किसी के लिए कोई कार्य किया जाए या फिर किसी के प्रति उपकार किया जाए , तो वहाँ संप्रदान कारक होता है । कहने का भाव यह है कि संज्ञा या सर्वनाम का वह रूप जिसके लिए क्रिया की जाए या किसी का उपकार किया जाए अथवा किसी को कुछ देने का भाव व्यक्त किया जाए , तो वहाँ पर संप्रदान कारक होता है । जैसे

पिता ने पुत्र के लिए पुस्तकें खरीदीं । मैंने मोहन को पुस्तक दी । मनुष्य धन के वास्ते दर – दर भटकता है । उपर्युक्त वाक्यों में पुत्र के लिए , मोहन को धन के वास्ते संप्रदान कारक हैं ।

के लिए , को , के वास्ते परसर्ग संप्रदान कारक में प्रयुक्त होते हैं ।

संप्रदान कारक का पता लगाने के लिए क्रिया से ‘ किसके लिए ‘ प्रश्न कीजिए । उत्तर में जो पद प्राप्त होगा , वह संप्रदान कारक में होगा ।

कर्म एवं संप्रदान कारक में अंतर

कर्म एवं संप्रदान – दोनों में ही ‘ को ‘ परसर्ग का प्रयोग किया जाता है परंतु इन दोनों में मूल अंतर यह है कि जहाँ देने या उपकार करने का भाव होगा वहाँ’को ‘ विभक्ति – चिह्न के होने पर भी संप्रदान कारक होगा , लेकिन अन्य स्थितियों में कर्मकारक होगा । जैसे

अखिल ने अपने मित्र को पुस्तक दी । ( देने का भाव होने के कारण संप्रदान कारक ) अखिल ने अपने मित्र को बुलाया । ( अन्य स्थिति के कारण कर्म कारक )

5. अपादान कारक

– संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से किसी व्यक्ति या वस्तु के अलग होने का भाव प्रकट हो , उसे अपादान कारक कहते हैं । जैसे – वृक्ष से पत्ते गिरते हैं । वह गाड़ी से गिर पड़ा । उपर्युक्त वाक्यों में वृक्ष से पत्तों का गिरना और उसका गाड़ी से गिरना – दोनों में ही अलगाव का भाव प्रकट हुआ है । अत : ‘ वृक्ष से ‘ और ‘ गाड़ी से ‘ पदों में अपादान कारक है । अपादान कारक में ‘ से ‘ परसर्ग का प्रयोग होता है । इसी तरह उत्पत्ति ( निकलना ) शिक्षा , तुलना , दूरी , भय , लज्जा , निषेध आदि अचों में भी अपादान कारक ही होता है ।

गंगा मा हिमालय से निकलती है । ( उत्पत्ति – निकलना के अर्थ ) में

गुरूजी से संगीत सीखूंगा  । ( शिक्षा के अर्थ में )

राम श्याम से बड़ा है । ( तुलना के अर्थ में )

सोनीपत दिल्ली से लगभग 50 किमी . दूर है । ( दूरी के अर्थ में )

तुम ससुर से लजाती हो । ( लज्जा के अर्थ में )

अनिल भय के मारे काँप रहा है । ( भय के अर्थ में )

तुम्हें खेलने से कौन रोकता है ? ( निषेध के अर्थ में )

करण और अपादान कारक में अंतर –

करण और अपादान – दोनों में ही परसर्ग ‘ से ‘ का प्रयोग होता है । परंतु दोनों में मूल अंतर यह है कि यदि संज्ञा या सर्वनाम पद करण ( साधन ) के अर्थ में प्रयुक्त हों तो वहाँ पर करण कारक होगा और यदि अपादान ( अलग होने ) का योध कराएँ , तो अपादान कारक में माने जाएंगे । जैसे

ललित गाड़ी से आया । यहाँ गाड़ी ‘ आने के साधन अर्थ में प्रयुक्त है । अत : ‘ गाड़ी से ‘ में करण कारक है । ललित गाड़ी से गिर पड़ा ! यहाँ गाड़ी से गिर पड़ने अर्थात् अलग होने का बोध हो रहा है । अत : ‘ गाड़ी से ‘ में अपादान कारक होगा ।

6.संबंध कारक –

संज्ञा या सर्वनाम का वह रूप , जिससे उसका संबंध किसी अन्य संज्ञा / सर्वनाम से दिखाया जाए , संबंध कारक कहलाता है । जैसे-

यह मोहन का कमरा है । कमरे की खिड़कियों चौकोर हैं । रमेश के कपड़े स्वच्छ है । आपका नाम सुधीर है । आपके भाई कोलकाता में रहते हैं । आपकी माताजी कल कोलकाता जा रही हैं । तुम्हारा मित्र कल मिला था । तुम्हारी तस्वीर मैली हो गई है । तुम्हारे मेहमानों की संख्या बहुत अधिक है । अध्यापक ने कहा- अपना कर्तव्य ठीक तरह निभाओ । अपनी इच्छाओं को अनियंत्रित मत होने दो । अपने सुख के साथ दूसरे के सुख का भी ध्यान रखो । 

उपर्युक्त वाक्यों में मोहन का , कमरे की , रमेश के , आपका , आपके , आपकी , तुम्हारा , तुम्हारी , तुम्हारे , अपना , अपनी , अपने आदि पदों में संबंध कारक है । संबंध कारक में का , के.की , रा , रे , री , ना , ने , नी जैसे विभक्ति – चिह्नों का प्रयोग किया जाता है । संबंध कारक में दो पद होते हैं । पूर्व पद ( संबंध कारक ) और उत्तर पद ( संबंधी पद ) जैसे –

रमेश के कपड़े में रमेश के पूर्व पद ( यानी संबंध कारक ) और कपड़े उत्तर पद ( अर्थात् संबंधी पद ) हैं ।

परसर्ग ( विभक्ति – चिह्न ) का लिंग / वचन ( संबंधी पद ) उत्तर पद के अनुसार की प्रयुक्त होता है । जैसे – रमेश की माता , रमेश का घर , रमेश की पुस्तकें , रमेश के कपड़े आदि । का , के , की का प्रयोग संज्ञा , सर्वनाम पदों के साथ होता है तथा रा , रे , री और ना , ने . नौ पदों का प्रयोग केवल सर्वनाम पदों के साथ होता है ।

अधिकरण कारक –

संज्ञा या सर्वनाम का वह रूप , जो क्रिया के होने के समय या स्थान संबंधी स्थिति को दर्शाए , अर्थात् संज्ञा / सर्वनाम के जिस रूप से क्रिया के होने के स्थान , समय संबंधी आधार का पता चले , उसे अधिकरण कारक कहते हैं । जैसे- बालक छत पर खेल रहे हैं । बंदर डाल पर बैठा है । पिताजी कमरे में हैं । अध्यापक कक्षा में पढ़ा रहे हैं । उपर्युक्त वाक्यों से पता चलता है कि खेलने की क्रिया छत पर हो रही है । इसी प्रकार बैठने की क्रिया को संपन्न होने का आधार डाल है । इस प्रकार ‘ छत पर ‘ , ‘ डाल पर ‘ , ‘ कमरे में ‘ , ‘ कक्षा में ‘ , आदि पदों में अधिकरण कारक हैं ।

समय संबंधी

परीक्षा मार्च  में होगी । मैं शनिवार को जाऊंगा  ।

-गाड़ी दस बजकर दस मिनट पर छुटती है  ।

उपयुक्त वाक्यों से पता चलता है कि क्रिया मार्च महीने के अंदर होगी , जाने की क्रिया शनिवार के ही समय सीमा  में होगी और गाड़ी छूटने की क्रिया एक निश्चित समय पर होगी । अत : मार्च में ‘ , ‘ शनिवार को ‘ , ‘ दस बजकर दस  मिनट पर ‘ वाक्यों में अधिकरण कारक है ।

अधिकरण कारक में – मैं , पर , के ऊपर , के अंदर , के भीतर , को आदि परसों का प्रयोग होता है । कभी – कभी परसर्ग – रहित अधिकरण का प्रयोग भी देखने में आता है । जैसे इस जगह पूर्ण शांति है । घर – घर घूमने से क्या फायदा ? तुम्हारे घर कोई आने वाला है । उपयुक्त वाक्यों में जगह पर , घर – घर में , घर पर के स्थान पर , जगह , घर – घर आदि परसर्ग रहित रूपों का प्रयौग  हुआ है ।

8. संबोधन कारक –

संज्ञा के जिस रूप से किसी को संबोधित किया जाए या पुकारा जाए , उसे संबोधन कारक कहते हैं । जैसे अरे मोहन । इतने दिन कहाँ रहे । ओ लड़के ! इतना शोर मत मचा । हे प्रभु ! मुझ पर दया करो ! बहुवचन में शब्द के अंत में ओ , यो प्रत्यय भी लग जाता है । जैसे –

बच्चो ! मेरी बात ध्यानपूर्वक सुनो ।। देवियो और सज्जनो ! कल उत्सव में उपस्थित रहना । उपयुक्त वाक्यों में अरे मोहन , ओ लड़के , हे प्रभु , बच्चो , देवियो और सज्जनो आदि पद संबोधन में हैं ।

संबोधन कारक में परसर्ग संज्ञा शब्दों से पूर्व आते हैं । ये कभी आते हैं , तो कभी नहीं आते हैं । जैसे – परसर्ग सहित – हे प्रभु ! हम पर दया – दृष्टि रखना । अरे मूर्ख शिव का विशाल धनुष तोड़ डाला । परसर्ग सहित – बच्चो , शोर मत करो । मर्यादा पुरुषोत्तम राम , आप अधीर न हों । संबोधन कारक विस्मयादिबोधक अव्यय हे , अरे , ओ आदि परसर्ग रूप में प्रयुक्त होते हैं । भय , विस्मय , घृणा , देतावनी , आश्चर्य आदि भावों के अनुकूल ही अव्ययों का प्रयोग किया जाता है ।

कारक संबंधी कुछ आवश्यक बातें

यद्यपि सभी कारकों के परसर्ग निश्चित हैं तथापि कुछ विशेष नियम इस प्रकार हैं

1. वाक्य में जब शब्दों का ( परसर्ग रहित / सहित ) प्रयोग कर दिया जाता है तो वे शब्द न रहकर पद बन जाते हैं जैसे- राम पत्र लिखता है । इस वाक्य में सभी शब्द पद कहलाएँगे । जैसे – राम , पत्र , लिखता है । इसी प्रकार राम ने रावण को वाण से मारा । इस वाक्य में राम ने , रावण को , बाण से , मारा आदि पद हैं ।

2. लाना , जाना , बोलना , भूलना जैसी सकर्मक क्रियाओं के भूतकालिक रूप में कर्ता के साथ ने का प्रयोग नहीं किय जाता है । जैसे रश्मि मिठाई लाई । कविता मेरी बात भूल गई । वह मुझसे झूठ बोला । मोहन मेरी सच्चाई जान गया ।

३. कर्म कारक के प्रयोग के समय जब कहना ‘ क्रिया पद का प्रयोग होता है तो कर्म के साथ को ‘ के स्थान पर से ‘ का प्रयोग किया जाता है । जैसे – में सबसे कहता हूँ कि ईमानदारी सर्वोत्तम नीति है ।

4. जब अधिकरण कारक के साथ निश्चित समय सूनक शब्दों का प्रयोग किया जाता है तो ‘ म ‘ के स्थान पर ( को ) परसर्ग का प्रयोग किया जाता है । जैसे – प्रफुल्ल के पिताजी संगलवार को जाएँगे ।

5. अकर्मक क्रियाओं के साथ प्रापः ‘ ने ‘ परसर्ग का प्रयोग नहीं होता . परंतु छोकना , खाँसना , नहाना जैसी कुछ अकर्मक क्रियाओं के साथ ने का प्रयोग किया जाता है । जैसे – तुमने छींक दिया , इसलिए अब काम नहीं बनेगा । वृद्ध ने खाँसा तो मेरी नींद खुल गई ।

6. कर्म कारक का परसर्ग ‘ को ‘ है , परंतु माँगना , पूछना , बात करना , किसी से प्यार करना , प्रार्थना करना आदि क्रियाओं के कर्म के साथ ‘ को ‘ के स्थान पर ‘ से ‘ का प्रयोग होता है और इन स्थितियों में कर्म कारक की बजाय अपादान कारक होता है । जैसे पिताजी मुझसे प्यार करते हैं । ( अपादान कारक ) रवि ने दिनेश से पुस्तक माँगी । ( अपादान कारक ) उसने मुझसे पता पूछा था । ( अपादान कारक ) मोहन ने ईश्वर से प्रार्थना की । ( अपादान कारक )

7. संबोधन के परसर्ग आरंभ में लगते हैं और शेष सभी परसर्ग शब्द के बाद आते हैं । जैसे- अरे बालको ! इधर आना । मोहन को घर जाना है ।

8. संज्ञा पदों में परसर्गों को पद से अलग लिखा जाता है परंतु सर्वनाम पदों में परसा को मिलाकर लिखते हैं । जैसे राम की पुस्तक अच्छी है । मैंने उसे बुलाया ।

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